बताया जाता है कि गुरु जी की सालियों ने मजाक करने के लिए गुरु जी को एक कच्ची दीवार के पास बिठा दिया, ताकि उनका शाही लिबास खराब हो जाए। वहां मौजूद एक बुजुर्ग महिला ने गुरु जी से कहा कि बेटा दीवार गिर सकती है, इसलिए वहां से उठ जाएं। इस पर गुरु जी ने दीवार को हाथ लगाकर मुस्कुराते हुए कहा, माता जी यह दीवार युगों-युगों तक नहीं गिरेगी और वैसा ही हुआ। यह दीवार आज भी सुरक्षित है।
हालांकि अब इस दीवार का पांच फीट तीन इंच ऊंचा, छह फीट लंबा और दो फीट मोटाई वाला हिस्सा ही शेष है। यहां माथा टेकने आने वाले लोग दीवार की मिट्टी उखाड़कर अपने साथ ले जाते थे। लोगों की धारणा थी कि यहां की मिट्टी को गुरु जी के पवित्र हाथ लगे हैं और इसे खाने से रोग दूर हो सकते हैं। बाद में इसे शीशे की फ्रेम से सुरक्षित कर दिया गया। करीब 70 साल पहले गुरुद्वारा श्री कंध साहिब की इमारत का निर्माण शुरू किया गया था। 1952 में गुरुद्वारा कमेटी ने इस स्थान को खरीदा।
18 दिसंबर, 1956 को गुरुद्वारे की दर्शनी डियोढ़ी का नींव पत्थर संत हरनाम सिंह नौशहरा मज्झा सिंह वालों ने रखा। गुरु नानक के ससुराल वालों का घर अब गुरुद्वारा श्री डेरा साहिब के नाम से जाना जाता है। यहां आने वाली संगत दीवार के सामने नतमस्तक होती है।
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