दिवाली (Diwali) महापर्व के चौथे दिन होने वाली गोवर्धन पूजा (Govardhan Puja) का काफी महत्व माना जाता है. इसे अन्नकूट के नाम से भी पहचाना जाता है. इस साल 02 नवंबर को धनतेरस से इस महापर्व की शुरुआत होने जा रही है. 04 नवंबर को दिवाली और उसके अगले दिन 05 नवंबर को गोवर्धन पूजा की जाएगी. दिवाली के एक दिन बाद शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा की जाती है. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण का पूजन भी किया जाता है. इसके अलावा भगवान को 56 भोग लगाने की भी परंपरा है. गोवर्धन पूजा के लिए घरों में गाय के गोबर से प्रतीकात्मक गोवर्धन पर्वत बनाकर पूजन की परंपरा है.
गोवर्धन पूजा के लिए गोवर्धन पर्वत बनाने की मान्यता के साथ इस दिन गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा (Gowardhan parvat parikrama) भी की जाती है. आखिर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा क्यों की जाती है. इसे लेकर धार्मिक मान्यता प्रचलित है. पौराणिक कथाओं में गोवर्धन पूजा की भी वजह बताई गई है. इनके अनुसार ब्रज पर इंद्र देवता ने जब कुपित होकर घनघोर बारिश की थी तब भगवान श्रीकृष्ण ने तूफान और बारिश से गांववालों की रक्षा करते हुए गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर सात दिनों तक उठाकर रखा था. इस वजह से गोवर्धन पूजा की शुरुआत हुई.
इस वजह से होती है गोवर्धन की परिक्रमा
गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा को लेकर धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी हो जाती है. वल्लभ संप्रदाय से ताल्लुक रखने वाले वैष्णवमार्गी अपने जीवन में कम से कम एक बार गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा जरूर करते हैं. यह भी मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी इच्छा को लेकर गोवर्धन पर्वत की अगर परिक्रमा करता है तो उसकी वजह इच्छा पूरी हो जाती है.
एक धार्मिक मान्यता ये भी है कि अगर कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में चारों धाम की यात्रा न कर सके तो उसे एक बार गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा जरूर करना चाहिए. गोवर्धन पूजा वाले दिन अगर कोई व्यक्ति गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करता है तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है. यही वजह है कि गोवर्धन पर्व के मौके पर हजारों श्रध्दालु गिरिराज की परिक्रमा करने के लिए पहुंचते हैं. गोवर्धन की परिक्रमा पूरी करने में लगभग दो दिन लग जाते हैं.
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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